ओशो

जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?

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जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?

सुबह आती है, तो मैं सुबह को स्वीकार कर लेता हूं और सांझ आती है, तो सांझ को स्वीकार कर लेता हूं। प्रकाश का भी आनंद है और अंधकार का भी। जब से यह जाना, तब से दुख नहीं जाना है।
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जन्म-मृत्यु से परे है जीवन!

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जन्म-मृत्यु से परे है जीवन!

मैं एक शवयात्रा में गया था। जो वहां थे, उनसे मैंने कहा- यदि यह शवयात्रा तुम्हें अपनी ही मालूम नहीं होती है, तो तुम अंधे हो। मैं तो स्वयं को अर्थी पर बंधा देख रहा हूं। काश! तुम भी ऐसा ही देख सको, तो तुम्हारा जीवन दूसरा हो जावे। जो स्वयं की मृत्यु को जान लेता है, उसकी दृष्टिं संसार से हटकर सत्य पर केंद्रित हो जाती है।
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यांत्रिक प्रवाह से मुक्ति!

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यांत्रिक प्रवाह से मुक्ति!

मंदिर और उपासना-गृहों में बैठने का कोई मूल्य नहीं है और तुम्हारे हाथों में ली गई मालाएं झूठी हैं, जब तक कि विचार के यांत्रिक प्रवाह से तुम मुक्त नहीं होते हो। जो विचारों की तरंगों से मुक्त हो जाता है, वह जहां भी है, वहीं मंदिर में है और उसके हाथ में जो भी कार्य है, वही माला है।
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सत्य की एक झलक

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सत्य की एक झलक

सत्य की एक किरण भी बहुत है। ग्रंथों का भार जो नहीं करता है, सत्य की एक झलक भी वह कर दिखाती है। अंधेरे में उजाला करने को प्रकाश के ऊपर बड़े-बड़े शास्त्र किसी काम के नहीं, एक मिट्टी का दीया जलाना आना ही पर्याप्त है।
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अंध-जीवेषणा

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अंध-जीवेषणा

मैंने सुना है कि क्राइस्ट ने लोगों को कब्रों से उठाया और उन्हें जीवन दिया। जो स्वयं को शरीर जानता हे, वह कब्र में ही है। शरीर के ऊपर आत्मा को जानकर ही कोई कब्र से उठता और जीवित होता है।
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संसार दर्पण है!

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संसार दर्पण है!

फूलों को सारा जगत फूल है और कांटों को कांटा। जो जैसा है, वैसा ही दूसरे उसे प्रतीत होते हैं। जो स्वयं में नहीं है, उसे दूसरों में देख पाना कैसे संभव है! सुंदर को खोजने, चाहे हम सारी भूमि पर भटक लें, पर यदि वह स्वयं के ही भीतर नहीं है, तो उसे कहीं भी पाना असंभव है।
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जीवन को विधायक आरोहण दो!

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जीवन को विधायक आरोहण दो!

जीवन से अंधकार हटाना व्यर्थ है, क्योंकि अंधकार हटाया नहीं जा सकता। जो जानते हैं, वे अंधकार को नहीं हटाते, वरन् प्रकाश को जलाते हैं।
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आंखों से सत्य देखो!

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आंखों से सत्य देखो!

सूर्य की ओर जैसे कोई आंखें बंद किये रहे, ऐसे ही हम जीवन की ओर किये हैं। और, तब हमारे चरणों का गड्ढों में चले जाना, क्या आश्चर्यजनक है? आंखें बंद रखने के अतिरिक्त न कोई पाप है, न अपराध है। आंखें खोलते ही सब अंधकार विलीन हो जाता है।
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स्वयं से पूछो : ''मैं कौन हूं?''

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स्वयं से पूछो : ''मैं कौन हूं?''

''मैं कौन हूं?'' जो स्वयं से इस प्रश्न को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की कुंजी यही है। स्वयं से पूछो कि ''मैं कौन हूं?'' और, जो प्रबलता से और समग्रता से पूछता है, वह स्वयं से ही उत्तर भी पा जाता है।
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त्याग धीरे-धीरे नहीं

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त्याग धीरे-धीरे नहीं

सत्य की ओर जीवन क्रांति अत्यंत द्रुत गति से होती है- सत्य की अंतदर्ृष्टिं भर हो, तो धीरे-धीरे नहीं, किंतु युगपत परिवर्तन घटित होते हैं। जहां स्वयं-बोध नहीं होता है, वही क्रम है, अन्यथा अक्रम में और छलांग में ही - विद्युत की चमक की भांति ही जीवन बदल जाता है।
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