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जिंदगी का सत्य!

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जिंदगी का सत्य!

जीवन झाग का बुलबुला है। जो उसे ऐसा नहीं देखते, वे उसी में डूबते और नष्ट हो जाते हैं। किंतु, जो इस सत्य के प्रति सजग होते हैं, वे एक ऐसे जीवन को पा लेने का प्रारंभ करते हैं, जिसका कि कोई अंत नहीं होता है।
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अतंरात्मा को आलोकित करो!

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अतंरात्मा को आलोकित करो!

मैं क्या सिखाता हूं? एक ही बात सिखाता हूं। अपनी अंतरात्मा के अलावा और कुछ अनुकरणीय नहीं है। वहां जो आलोक का आविष्कार कर लेता है, उसका समग्र जीवन आलोक हो जाता है। फिर उसे बाहर की मिट्टी के दियों का सहारा नहीं लेना होता और दूसरों की धुआं छोड़ती मशालों के पीछे नहीं चलना पड़ता है। इनसे मुक्त होकर ही कोई व्यक्ति आत्मा के गौरव और गरिमा को उपलब्ध होता है।
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अंतस में खोजो

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अंतस में खोजो

आनंद चाहते हो? आलोक चाहते हो? तो सबसे पहले अंतस में खोजो। जो वहां खोजता है, उसे फिर और कहीं नहीं खोजना पड़ता है। और, जो वहां नहीं खोजता, वह खोजता ही रहता है, किंतु पता नहीं है।
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जीवन संगीत

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जीवन संगीत

एक युवक ने मुझ से पूछा, ''जीवन में बचाने जैसा क्या है?'' मैंने कहा, ''स्वयं की आत्मा और उसका संगीत। जो उसे बचा लेता है, वह सब बचा लेता है और जो उसे खोता है, वह सब खो देता है।''
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आत्म-गहराई!

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आत्म-गहराई!

सुबह कुछ लोग आए थे। उनसे मैंने कहा, ''सदा स्वयं के भीतर गहरे से गहरे होने का प्रयास करते रहो। भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिसकी गहराई है, अगोचर उसकी ऊंचाई हो जाती है।''
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'मैं' का बंधन!

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'मैं' का बंधन!

'मैं' को भूल जाना और 'मैं' से ऊपर उठ जाना सबसे बड़ी कला है। उसके अतिक्रमण से ही मनुष्य मनुष्यता को पार कर द्वियता से संबंधित हो जाता है। जो 'मैं' से घिरे रहते हैं, वे भगवान को नहीं जान पाते। उस घेरे के अतिरिक्त मनुष्यता और भगवत्ता के बीच और कोई बाधा नहीं है।
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जिंदगी का कितना मूल्य है? ओशो

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जिंदगी का कितना मूल्य है? ओशो

च्वांगत्सु चीन में हुआ, एक फकीर था। लोगों ने उसे हंसते ही देखा था, कभी उदास नहीं देखा था। एक दिन सुबह उठा और उदास बैठ गया झोपड़े के बाहर! उसके मित्र आये, उसके प्रियजन आये और पूछने लगे, आपको कभी उदास नहीं देखा। चाहे आकाश में कितनी ही घनघोर अंधेरी छायी हो और चाहे जीवन पर कितने ही दुखदायी बादल छाये हों, आपके होठों पर सदा मुस्कुराहट देखी है। आज आप उदास क्यों हैं? चिंतित क्यों हैं?

च्वांगत्सु कहने लगा, आज सचमुच एक ऐसी उलझन में पड़ गया हूं, जिसका कोई हल मुझे नहीं सूझता। Read : जिंदगी का कितना मूल्य है? ओशो about जिंदगी का कितना मूल्य है? ओशो

जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?

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जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?

सुबह आती है, तो मैं सुबह को स्वीकार कर लेता हूं और सांझ आती है, तो सांझ को स्वीकार कर लेता हूं। प्रकाश का भी आनंद है और अंधकार का भी। जब से यह जाना, तब से दुख नहीं जाना है।
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जन्म-मृत्यु से परे है जीवन!

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जन्म-मृत्यु से परे है जीवन!

मैं एक शवयात्रा में गया था। जो वहां थे, उनसे मैंने कहा- यदि यह शवयात्रा तुम्हें अपनी ही मालूम नहीं होती है, तो तुम अंधे हो। मैं तो स्वयं को अर्थी पर बंधा देख रहा हूं। काश! तुम भी ऐसा ही देख सको, तो तुम्हारा जीवन दूसरा हो जावे। जो स्वयं की मृत्यु को जान लेता है, उसकी दृष्टिं संसार से हटकर सत्य पर केंद्रित हो जाती है।
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यांत्रिक प्रवाह से मुक्ति!

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यांत्रिक प्रवाह से मुक्ति!

मंदिर और उपासना-गृहों में बैठने का कोई मूल्य नहीं है और तुम्हारे हाथों में ली गई मालाएं झूठी हैं, जब तक कि विचार के यांत्रिक प्रवाह से तुम मुक्त नहीं होते हो। जो विचारों की तरंगों से मुक्त हो जाता है, वह जहां भी है, वहीं मंदिर में है और उसके हाथ में जो भी कार्य है, वही माला है।
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