मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं छोटे-छोटे बच्चों को क्यों संन्यास दे देता हूं?

मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं छोटे-छोटे बच्चों को क्यों संन्यास दे देता हूं?

इसीलिए क्योंकि उनको संन्यास देना सुगमतम है। इसीलिए क्योंकि उनको तो अभी से अगर ध्यान में रस आ जाए तो तुम जिन परेशानियों से परेशान हो रहे हो, वे कभी परेशान न होंगे। बीमारी हो जाए, फिर उसका इलाज करने से बेहतर बीमारी को पहले ही रोक लेना है।

छोटे बच्चे अगर ध्यान में उत्सुक हो जाएं, तो बीमारी पहले ही रुक गई। बीमारी पैदा ही न होगी।

तुम्हारी तो बहुत बीमारियां पैदा हो गई हैं। अब उसमें ध्यान की एकाध बूंदाबांदी पड़ती भी है तो कहां खो जाती है, पता नहीं चलता--इतना कचरा तुमने इकट्ठा कर रखा है!

छोटे बच्चे कोरी स्लेट हैं। अभी उनके ऊपर अगर परमात्मा की छाप पड़ जाए, शांति की भनक पड़ जाए, उत्सव का रस आ जाए, अगर थोड़ी प्रतीति उन्हें होने लगे अदृश्य की, तो जितनी जल्दी अभी हो सकती है इतनी जल्दी फिर कभी नहीं होगी। जितनी देर हो गई उतनी मुश्किल हो गई।

अपने बच्चों को भी, हरिप्रसाद, लाओ। अपनी पत्नी को भी लाओ। और धीरे-धीरे उनको भी डुबाओ। सब डूबो। इकट्ठे डूबो। पूरा परिवार डूबे।

और मैं तो संन्यास ऐसा नहीं चाहता कि तुम जंगल भाग जाओ। मैं तो संन्यास ऐसा चाहता हूं कि तुम डूबो, तुम्हारा परिवार डूबे, सब डूबें। और तुम जहां हो, जैसे हो, वैसे ही डूबो।

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