शांति की प्राप्ति!

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शांति की प्राप्ति!

'जीवन में सबसे बड़ा रहस्य सूत्र क्या है?' जब कोई मुझ से यह पूछता है, तो मैं कहता हूं, ''जीते जी मर जाना।''
किसी सम्राट ने एक युवक की असाधारण सेवाओं और वीरता से प्रसन्न होकर उसे सम्मानित करना चाहा। उस राज्य का जो सबसे बड़ा सम्मान और पद था, वह उसे देने की घोषणा की गई। लेकिन, ज्ञात हुआ कि वह युवक इससे प्रसन्न और संतुष्ट नहीं है। सम्राट ने उसे बुलाया और कहा, ''क्या चाहते हो? तुम जो भी चाहो, मैं उसे देने को तैयार हूं। तुम्हारी सेवाएं निश्चय ही सभी पुरस्कारों से बड़ी है।'' वह युवक बोला, ''महाराज, बहुत छोटी-सी मेरी मांग है। उसके लिए ही प्रार्थना करता हूं। धन मुझे नहीं चाहिए- न ही पद, न सम्मान, न प्रतिष्ठा। मैं चित्त की शांति चाहता हूं।'' राजा ने सुना तो थोड़ी देर को तो वह चुप रह गया। फिर बोला, ''जो मेरे पास ही नहीं है, उसे मैं कैसे दे सकता हूं!'' फिर वह सम्राट उस व्यक्ति को पहाड़ों में निवास करने वाले एक शांति को उपलब्ध साधु के पास लेकर स्वयं ही गया। उस व्यक्ति ने जाकर अपनी प्रार्थना साधु के समक्ष निवेदित की। वह साधु अलौकिक रूप से शांत और आनंदित था। लेकिन, सम्राट ने देखा कि उस युवक की प्रार्थना सुनकर वह भी वैसा ही मौन रह गया, जैसे कि स्वयं सम्राट रह गया था! सम्राट ने संन्यासी से कहा, ''मेरी भी प्रार्थना है, इस युवक को शांति दें। अपनी सेवाओं ओर समर्पण के लिए राजा की ओर से यही पुरस्कार उसने चाहा है। मैं तो स्वयं ही शांत नहीं हूं, इसलिए शांति कैसे दे सकता हूं? सो इसे आपके पास लेकर आया हूं।'' वह संन्यासी बोला, ''राजन शांति ऐसी संपदा नहीं है, जो कि किसी दूसरे से ली-दी जा सके। उसे तो स्वयं ही पाना होता है। जो दूसरों से मिल जाए वह दूसरों से छीनी भी जा सकती है। अंतत: मृत्यु तो उसे निश्चित ही छीन लेती है। जो संपत्ति किसी और से नहीं, स्वयं से ही पाई जाती है, उसे ही मृत्यु छीनने में असमर्थ है। शांति मृत्यु से बड़ी है, इसलिए उसे और कोई नहीं दे सकता है।''
एक संन्यासी ने ही यह कहानी मुझे सुनाई थी। सुनकर मैंने कहा, ''निश्चय ही मृत्यु शांति को नहीं छीन सकती है, क्योंकि, जो मृत्यु से पहले ही मरना जान लेते हैं, व ही ऐसी शांति को उपलब्ध कर पाते हैं।''
क्या तुम्हें मृत्यु का अनुभव है? यदि नहीं, तो तुम मृत्यु के चंगुल में हो। मृत्यु के हाथों में स्वयं को सदा अनुभव करने से छटपटाहट होती है, वही अशांति है। जो ऐसे जीने लगते हैं कि जैसे जीवित होते हुए भी जीवित न हों, वह मृत्यु को जान लेता है और जानकर मृत्यु के पार हो जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

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