स्व-सत्ता ही सर्वोपरि!

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स्व-सत्ता ही सर्वोपरि!

जो स्वयं को खोकर सब-कुछ भी पा ले, उसने बहुत महंगा सौदा किया है। वह हीरा देकर कंकड़ बीन लाया है। उससे तो वही व्यक्ति समझदार है, जो कि सब-कुछ खोकर भी स्वयं को बचा लेता है।
एक बार किसी धनवान के महल में आग लग गई थी। उसने अपने सेवकों से बड़ी सावधानी से घर का सारा सामान निकलवाया। कुर्सियां, मेजें, कपड़े की संदूकें, खाते बहियां, तिजोरियां और सब कुछ। इस बीच आग चरों ओर फैलती गई। घर का मालिक बाहर आकर सब लोगों के साथ खड़ा हो गया था। उसकी आंखों में आंसू थे और किंकर्तव्यविमूढ़ वह अपने प्यारे भवन को अग्निसात होते देख रहा था। अंतत: उसने लोगों से पूछा, ''भीतर कुछ रह तो नहीं गया है?'' वे बोले, ''नहीं, फिर भी हम एकबार और जाकर देख आते हैं।'' उन्होंने भीतर जाकर देखा, तो मालिक का एकमात्र पुत्र कोठरी में पड़ा देखा। कोठरी करीब-करीब जल गई थी और पुत्र मृत था। वे घबड़ाकर बाहर आए और छाती पीट-पीटकर रोने-चिल्लाने लगे, ''हाय! हम अभागे, घर का सामान बचाने में लग गये, किंतु सामान के मालिक को खो दिया है।''
क्या यह घटना हम सबके संबंध में भी सत्य नहीं है। और क्या किसी दिन हमें भी यह नहीं कहना पड़ेगा कि हम अभागे न मालूम क्या-क्या व्यर्थ का सामान बचाते रहे और उस सबके मालिक को- स्वयं अपने आप को खो बैठे? मनुष्य के जीवन में इससे बड़ी कोई दुर्घटना नहीं होती है। लेकिन, बहुत कम ऐसे भाग्यशाली हैं, जो इससे बच पाते हैं।
एक बात स्मरण रखना कि स्वयं की सत्ता से ऊपर ओर कुछ नहीं है। जो उसे पा लेता है, वह सब पा लेता है। और, जो उसे खोता है, उसके कुछ- भी पा लेने का कोई मूल्य नहीं है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

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